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Friday, August 12, 2011

लोकपाल हूँ मै !


सरकार का दलाल हूँ
गरीब का रोटी दाल हूँ
सबके जी का जंजाल हूँ
हर पल का बवाल हूँ
राजनीति का सवाल हूँ
हर पल ठोका गया हूँ
हर दम रोका गया हूँ
दबाया गया हूँ डराया गया हूँ
ठोकपाल हूँ मै
लोकपाल हूँ मै !

लोककल्याण को चला हूँ मै
राजनीति में पला हूँ मै
कूटनीति से जला हूँ मै
नेताओं से छला हूँ मै
आत्मा मेरी खो गयी
नहीं अब भला हूँ मै
ठोकपाल हूँ मै
लोकपाल हूँ मै !

एक कागज का प्रस्ताव हूँ मै
नेताओं का लुभाव हूँ मै
सत्ता के गलियारे में
उम्मीद के अंधियारे में
राजनीती का धंधा हूँ मै
सब दिखता है पर अँधा हूँ मै
अन्ना की तमन्ना हूँ मै
हर पल चौकन्ना हूँ मै
सत्ता का भोगकाल हूँ मै
ठोकपाल हूँ मै
लोकपाल हूँ मै !

सबके मन में उठता एक
अनोखा सवाल हूँ मै
राजनीति का जाल हूँ मै
हर पल कमाल हूँ मै
रामदेव का खोया ब्रम्हास्त्र हूँ मै
कूटनीति का शास्त्रार्थ हूँ मै
भारत का दुर्भाग्य हूँ मै
सबने ठोका अवसर पाकर
भाग गए सब पीठ दिखाकर
ठोकपल हूँ मै
लोकपाल हूँ मै !

यह कविता क्यों ? लोकपाल जनता की आत्मा जैसी विधेयक है किन्तु राजनीतिज्ञों ने इसकी आत्मा निकाल अपने वोट बैंक का ब्रम्हास्त्र बना डाला है और अब सिर्फ एक छलावा रह गया है लोकपाल ! वर्तमान समय में कोई भी राजनैतिक पार्टी लोकपाल बिल को पारित नहीं होने देना चाहती है सभी एक दुसरे का मौन सहयोग कर भारत की जनता के साथ केवल नाटक कर रहे हैं ! अनुरोध है कलमकार आगे आये और लोकपाल को अपने दम पर मजबूत बनायें ! जय भारत

अरविन्द योगी

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